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छत्तीसगढ़ी साहित्यकार

दुर्गा प्रसाद पारकर

“भाखा म आत्मा के आवाज होथे, जेन मन के गहराई ले निकले ला जनायथे।”

दुर्गा प्रसाद पारकर जी छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के प्रखर संवाहक, कुशल संपादक और समर्पित समाजसेवी हैं, जिन्होंने पिछले चार दशकों से छत्तीसगढ़ी भाषा के उन्नयन के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया है। उनके प्रयासों से छत्तीसगढ़ी भाषा को 2007 में राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ और 2013 में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में एम.ए. पाठ्यक्रम के रूप में मान्यता मिली। वे न केवल एक प्रखर साहित्यकार हैं बल्कि बहुआयामी संस्था चिन्हारी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय हैं। हाल ही में उन्हें North America Chhattisgarh Association (NACHA) द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण हेतु Certificate of Honour प्रदान किया गया है, जो उनके अथक प्रयासों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है।

वर्तमान में दुर्गा प्रसाद पारकर जी द्वारा संपादित पुस्तक ‘माता कौशल्या जन्मभूमि कोसला’ का विमोचन सम्पन्न हुआ, जिसमें चिन्हारी सम्मान–2025 से दुर्ग सांसद विजय बघेल को सम्मानित किया गया। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कोसला गांव को माता कौशल्या की जन्मभूमि के रूप में रेखांकित किया है।

उन्होंने इस तथ्य को देश-दुनिया के समक्ष लाने और कोसला को तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करने की मांग रखी है। दुर्गा प्रसाद पारकर जी ने राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में एमए छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम शुरू करवाने के प्रयासों का विशेष उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक जड़ों को पहचान दिलाना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है। उनका जीवन कार्यशीलता, संस्कृति, और मातृभाषा के प्रति समर्पण का प्रेरणास्रोत है।

शैक्षणिक पृष्ठभूमि

दुर्गा प्रसाद पारकर जी की प्रारंभिक शिक्षा उनके गाँव में ही सम्पन्न हुई, जहाँ से उन्होंने अध्ययन की बुनियादी नींव रखी। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर से वाणिज्य में स्नातकोत्तर (M.Com) तथा हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.) की उपाधियाँ प्राप्त कीं। हिन्दी भाषा और साहित्य में विशेष अभिरुचि होने के कारण उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा एवं लोकसंस्कृति पर गहन अध्ययन और लेखन किया, जिससे उन्हें साहित्यिक और अकादमिक क्षेत्रों में विशिष्ट पहचान मिली।

उनकी शैक्षणिक यात्रा केवल औपचारिक डिग्रियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को विश्वविद्यालय स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए दृढ़ प्रयास किए। उनके निर्देशन व प्रेरणा से पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय सहित कई संस्थानों में छत्तीसगढ़ी एम.ए. पाठ्यक्रम प्रारंभ हुए। वे न केवल एक विद्वान हैं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में सांस्कृतिक चेतना और मातृभाषा के गौरव को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख स्तंभ भी हैं।

कार्यक्षेत्र / पेशेवर अनुभव

दुर्गा प्रसाद पारकर जी का कार्यक्षेत्र बहुआयामी, व्यापक और समाज-संलग्नता से भरपूर रहा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत भिलाई स्टील प्लांट (BSP) में सेवा करते हुए की, और वहीं से साहित्य व सामाजिक चेतना के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। उन्होंने आकाशवाणी, दूरदर्शन, और छत्तीसगढ़ी सिनेमा में भी अपना रचनात्मक योगदान दिया। उनके द्वारा लिखे गए कई छत्तीसगढ़ी गीत फिल्मों में लोकप्रिय हुए हैं, जिन्हें पार्श्वगायक पद्मश्री महेंद्र कपूर और साधना सरगम जैसे प्रसिद्ध गायकों ने स्वर दिया है।

वे News18, देशबन्धु, दैनिक भास्कर जैसे प्रमुख समाचार माध्यमों में नियमित रूप से लेखन करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा, लोकसंस्कृति और सामाजिक विषयों पर अनेक पुस्तकों का लेखन व संपादन किया है। पिछले 25 वर्षों से वे साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘चिन्हारी’ के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व कर रहे हैं, जिसके माध्यम से उन्होंने भाषा-संरक्षण, सांस्कृतिक जागरूकता और नई पीढ़ी में मातृभाषा के प्रति आत्मगौरव उत्पन्न करने हेतु महत्वपूर्ण पहल की है। उनकी कार्यशैली जन-सरोकारों से गहराई से जुड़ी रही है और वे छत्तीसगढ़ की अस्मिता को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने हेतु सतत प्रयत्नशील हैं।

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प्रमुख कृतियाँ

दुर्गा प्रसाद पारकर जी छत्तीसगढ़ एवं हिंदी साहित्य जगत के एक समर्पित और बहुविधा रचनाकार हैं। उनकी साहित्यिक यात्रा बहुस्तरीय रही है

पुरस्कार

दुर्गा प्रसाद पारकर जी को साहित्य, संस्कृति और राजभाषा योगदान हेतु राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

सामाजिक योगदान

दुर्गा प्रसाद पारकर जी का सामाजिक दृष्टिकोण हमेशा से गहराई और संवेदनशीलता से भरा रहा है।

संचार माध्यम

उन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों, साहित्यिक पत्रिकाओं और मंचों पर लेखन व संपादन के माध्यम से सक्रिय संवाद और अभिव्यक्ति की भूमिका निभाई।